Sunday, August 12, 2007

कुँवर बेचैन की दो कविताएँ

जिंदगी की राहों में खुशबुऒं के घर रखना
आँख में नई मंजिल पांव में सफर रखना
सिर्फ छाँव में रहकर फूल भी नहीं खिलते
चांदनी से मिलकर भी धूप की खबर रखना
लोग जन्म लेते ही पंख काट देते हैं
है बहुत बहुत मुश्किल बाजु़ऒं में पर रखना

हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले
उनको हथियार बनाने पर तुली है दुनिया
नन्हे बच्चों से कुँवर छीन के भोला बचपन
उनको होशियार बनाने पर तुली है दुनिया

1 Comments:

Blogger Arun Mittal "Adbhut" said...

फूल को खार बनाने पे तुली है दुनिया
सबको बीमार बनाने पे तुली है दुनिया

मैं महकती हुई मिट्टी हूँ किसी आँगन की
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया

11:05 PM, March 05, 2009  

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